पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 19 से 26 नवंबर तक 2017 महादेव स्टेट कामधेनु मैदान , कृष्णा कुंज सोसाइटी के सामने, गणेश चौक नई RTO रोड वस्त्राल, अहमदाबाद में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
महाराज श्री ने कहा कि हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर ही भगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है।
महाराज श्री ने आगे कहा की पहले हम सब को भगवान की भक्ति करने पर ही जोर दिया है। महाराज श्री ने हमको बताया कि प्रभु भक्ति से ही हम सब के पाप आसानी से धुल जाते है। क्योँकि आज के इस कलयुग में सभी अपने अपने काम करने में ही लगा रहता है। उसको भगवान की भक्ति करने का भी समय नहीं रहता है। लेकिन अपने जीवन को सही ढंग से जीने के लिए और अपने जीवन की सभी समस्याओं को दूर करने के लिए हमको भगवान की पूजा करनी चाहिए।
भगवान की पूजा करने के लिए सबसे पहले तो हमारा मन स्वच्छ और साफ़ होना चाहिए। क्योँकि साफ़ और सवच्छ मन में ही भगवान का वास होता है। जब हमारा मन साफ होगा तो तभी हमारे मन में दूसरों के लिए अच्छे विचार आएंगे। जब हम दूसरों से प्यार करेंगे तो स्वयं भगवान भी हमसब से प्रेम करेंगे। और हमारे जीवन में आने वाली सभी समस्याओं को दूर कर देंगे। प्रभु भक्ति से ही हम सब का हर तरह से कल्याण हो सकता है।
इसलिए तो हम सबको कभी न कभी भागवत कथा का श्रावण करना चाहिए। भागवत कथा हमको इंसान बनाती है। भगवात कथा ही हम सब को सही मायने में जीना सिखाती है। यहाँ पर महाराज श्री ने बताया कि यदि हम सात दिन की भागवत कथा को सुनेंगे तो अवश्य ही हमको इन सात दिनों में बहुत कुछ ऐसा सिखने को मिलेगा जो हम सब के लिए लाभकारी होगा और जिसके बारे में कभी भी हमने सुना ही नहीं होगा।
महाराज श्री ने कहा कि भगवान त्रिलोकीनाथ जी की कृपा से ही हम सब को यह मानव जीवन प्राप्त होता है। उन्ही की कृपा से ही हम सब इस भागवत कथा को सुनते है। कहते है कि अगर मानव जीवन प्राप्त करने के बाद यदि हमने भगवान की भक्ति नहीं की ,अगर जीव ने दानपुण्य नहीं किया,अगर जीव सुरमा नहीं है ,अगर जीव भक्त है है ,अगर जीव तपस्वी नहीं है ,ऐसे व्यक्ति को मानव कहना बिलकुल ही गलत है। ऐसा मनुष्य तो केवल माँ का मलमूत्र ही है। इसके आलावा और कुछ भी नहीं होता है।
उसे तो केवल माँ का मलमूत्र ही कहना उचित होता है। उसे तो मानवों की शृंखला में रखना ही गलत होता है। जिसने मानव जीवन पा कर तपस्या नहीं की ,दानपुण्य नहीं किया ,सुरमा नहीं हुआ ,भगवान का भक्त नहीं हुआ, ऐसे मानव जीवन को पाकर तो सिर्फ लाभ ही क्या हुआ। ना जाने आपके कितने जन्मों के पुण्य के फल के दवारा ही आपको इस श्रीमद भागवत कथा को सुनने का सौभाग्य आपको प्राप्त हुआ है
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।





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