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पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में ९ से १५ नवंबर तक 2017 कटरा बाजार सीतामढ़ी थाना कोइरुन तहसील ज्ञानपुर, भदोही में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
सर्वप्रथम महाराज श्री ने विश्व शांति के लिए ठाकुर जी से प्रार्थना की और उसके बाद भागवत कथा में प्रवेश किया। महाराज श्री ने बताया की भागवत में आने से हमे सभी तीर्थो का पुण्य प्राप्त हो जाता है। क्योकि जहाँ भागवत कथा होती है वहां सभी पवित्र नदिया , सभी देवता , सारे तीर्थ वास करते है। और कथा पंडाल में आकर भागवत सुनने मात्रा से ही हमे सभी तीर्थो का पुण्य लाभ हमको प्राप्त हो जाता है। पूर्व के युगो में जो हजारों वर्षो की तपस्या करके भगवान की प्राप्ति होती थी। परन्तु कलियुग में केवल नाम संकीर्तन व कथा श्रवण मात्र से ही मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। प्रत्येक पुराण में कलियुग के प्राणियों के लिए चिंता वयक्त की, कि किस प्रकार कलयुगी मनुष्य का उद्धार हो कारण बस इतना है की आज का मानव धर्म को सर्वोपरि नहीं धन को सर्वोपरि मानता है।
पूर्व काल में एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम आत्मदेव था। वह बहुत ज्ञानी और तेजस्वी था। उसकी पत्नी धुन्धुली कुलीन होने पर भी अपनी बात पर अड़नेवाली थी। वह क्रूर, झगडालू और कंजूस थी। बहुत समय बीत जाने के बाद भी उन दोनों के यहाँ संतान नही हुई। उन्होंने बहुत तरह से दान धर्म निभाया पर कुछ नही हुआ।
एक दिन आत्मदेव दुखी होकर घर छोड़ कर वन को चला गया। वह एक तालाब के पास पंहुचा। पानी पी कर बैठा तो उसने एक सन्यासी महात्मा को वहाँ आते देखा। आत्मदेव ने सन्यासी के चरणों में प्रणाम किया और लम्बी लम्बी साँसे लेने लगा। सन्यासी ने उसके दुःख का कारण पूछा तो वह बोला कि अब देवता और ब्राह्मण भी उसका दिया प्रसन्न मन से स्वीकार नही करते। उसके संतान न होने से वह बहुत दुखी है और आत्महत्या करने आया है। उसके संतानहीन जीवन, घर और धन को धिक्कार है।
जब आत्मदेव सन्यासी के सामने ये सब कहकर रोने लगा तब महात्मा को बहुत दया आई। उन्होंने आत्मदेव से कहा कि मैनें तुम्हारे माथे कीलकीरों में पढ़ा है कि सात जन्मों तक तुम्हारे कोई संतान नही हो सकती इसलिए तुम संसार की वासना छोड़ कर संन्यास ले लो। परन्तु ब्राह्मण ने कहा कि जिसमें पुत्र और स्त्री का सुख नही है वह संन्यास भी नीरस है। महात्मा ने समझाते हुए कहा कि विधाता का लेख मिटाने पर भी तुम्हे संतान से सुख नही मिलेगा।
जब वह ब्राह्मण किसी प्रकार नही माना, तब सन्यासी ने उसे एक फल दिया और कहा कि ये अपनी पत्नी को खिला देना। इससे एक पुत्र होगा। अगर तुम्हारी पत्नी एक साल तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखेगी तो बालक बहुत शुद्ध स्वभाव वाला होगा।
ब्राह्मण ने वह फल अपनी पत्नी को दिया और कहीं चला गया। उसकी पत्नी कुटिल स्वभाव कि थी। उसने अपनी सखी से कहा कि मैं यह फल खाऊँगी तो मुझे बहुत कष्ट सहने पड़ेंगे। प्रसव कि पीड़ा, नियमों का पालन आदि सब करना होगा। इसलिए मैं ये फल नही खाऊँगी। उसके पति ने जब घर आकर पूछा कि फल खा लिया तो उसने कहा हाँ खा लिया।
धुन्धुली ने अपनी बहन को सब बात बतायी तो वह बोली कि मेरे पास एक उपाए है। उसकी बहन ने कहा कि मेरे पेट में जो बच्चा है वो मैं तुझे दे दूँगी। तक तक तू गर्भवती के समान घर में गुप्त रूप से रह। तू मेरे पति को कुछ धन दे देगी तो वो तुझे अपना बालक दे देंगे। हम ऐसी युक्ति करेंगे जिससे सब यही कहें कि मेरा बालक छेह महीने का होकर मर गया। फिर मैं तेरे घर आकर उस बालक का पालन पोषण करती रहूंगी। और यह फल तू गौ को खिला दे।
ब्राह्मणी ने सब कुछ अपनी बहन के कहे अनुसार किया। जब उसकी बहन को पुत्र हुआ तो उसकेपति ने चुपचाप उसे धुन्धुली को दे दिया। आत्मदेव बालक के होने ही ख़बर सुनकर बहुत आनंदित हुआ। उसकी स्त्री ने कहा कि बालक के पालन पोषण के लिए मैं अपनी बहन को यहाँ बुला लेती हूँ। आत्मदेव ने कहा ठीक है। उस बच्चे का नाम धुंधकारी रख दिया।
तीन महीने बाद उस गौ ने भी एक मनुष्य के आकार के बच्चे को जन्म दिया। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ और आत्मदेव के भाग्य कीसराहना करने लगे। आत्मदेव ने बालक के गौ के से कान देखकर उसका नाम गोकर्ण रख दिया।
जब वे दोनों बालक जवान हुए तो गोकर्ण बहुत बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ किंतु धुंधकारी बहुत दुष्ट निकला। चोरी करना, सबसे द्वेष बढाना, दूसरे के बालकों को कुएं में डालना और सबको तंग करना यही उसका स्वभाव था। उसने वेश्याओं के जाल में फँस कर अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। जब सब कुछ ख़तम हो गया तो आत्मदेव बहुत दुखी हुआ और कहने लगा कि इससे तो मेरी पत्नी बाँझ ही रहती। अब मैं कहाँ जाऊं और क्या करूं।
उसी समय गोकर्ण ने आकर अपने पिता को समझाया कि यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुखरूप और मोह में डालने वाला है। सुख न तो इन्द्र को है और न ही चक्रवर्ती राजा को। सुख केवल एकांतजीवी विरक्त मुनि को है। "यह मेरा पुत्र है" इस अज्ञान-को छोड़ दीजिये। मोह से नरक कीप्राप्ति है। इसलिए सबकुछ छोड़ कर वन में चले जाइए। गोकर्ण की बात सुनकर आत्मदेव को बहुत अच्छा लगा। उसने अपने पुत्र से उसे और उपदेश देने को कहा।
गोकर्ण ने कहा यहशरीर हड्डी, मांस और रुधिर का पिंड है। इसे मैं मानना छोड़ दीजिये। स्त्री पुत्र आदि को अपना कभी ना मानें। भगवान् का भजन सबसे बड़ा धर्म है। निरंतर उसी का आश्रय लिए रहे। आत्मदेव ने अपने पुत्र की बात सुनकर घर त्याग दिया और वन में रात दिन भगवान् की सेवा- पूजा करने लगा। नियमपूर्वक भागवत के दशम स्कंध का पाठ करने से उसने भगवान् श्री कृष्ण चंद्र को प्राप्त कर लिया।
हम भी इसी प्रकार भगवान् का भजन कर उस प्रभु को अपने चित्त में धारण कर इस मांस,हड्डी और रुधिर के इस नाशवान शरीर अपना न मान कर केवल उस अजर अमर आत्मा को जिसमे मेरा ठाकुर बसा है उसको अपना माने।
" राधे राधे बोलना पड़ेगा "

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