पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर 14 - 15 जनवरी, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश आयोजित श्री कृष्ण कथा के प्रथम दिवस पर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा कि गोस्वामी तुलसी दास बाबा जिन्होंने मानव जीवन के लिए लिखा कि यह जीवन एक यात्रा हैं आने वाले इतिहास में जब भी कोई चर्चा होगी हमारे नाम की तो इसमें लिखा जायेगा कि इसमें किसकी यात्रा अच्छी थी और किसकी यात्रा बुरी। अब तक ता इतिहास उठाइये चाहे राम-रावण का, चाहे कृष्ण-कंस का और चाहे पह्रलाद-हिरणाकश्यप की हो। कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हे हम आज भी याद करते हैं। और कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हे हम कभी यद् नहीं करना चाहते हैं। जिन्हे हम सिर्फ जलाना चाहते हैं।
जीवन की यात्रा के बारे में बताते हुए महराज श्री ने कहा कि यही हैं " जीवन की यात्रा" दुर्लभो मानषु जन्मः अथार्त कि मानब शरीर दुर्लभ हैं पर इस शरीर का एक पल का भरोसा नहीं हैं। एक क्षण का भी भरोसा नहीं हैं की में कान्हा से चला हु और कँहा पर पहुंच जाऊं, इस यात्रा को कैसे पूरा किया जाये कैसे निभाया जाये ये सारी जिम्मेदारी हमारी हैं। जीवन आपका हैं किसी और का नहीं जिम्मेदारी जीवन के प्रति आपकी हैं किसी और की नहीं हैं, तुम्हारे निर्णय तुम्हारे जीवन को बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जिससे आप अपनी यात्रा को यादगार बना सकते हैं। ........अब हम सबको इस बात का ख्याल रखना चाहिए की हमे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ये सब अब हम सबकी जिम्मेदारी हैं मेरे जीवन की यात्रा कैसे होनी चाहिए ........... सुखद या दुखद या फिर अच्छी या बुरी, ये मेरी जीवन यात्रा मुझे विवश करेगी " मुझे मरने पर " और एक जीवन यात्रा मुझे विवश करेगी मुझे मुझे आनंद प्रफुल्लित के लिए और इसी तरह मानव जीवन का उद्देश्य पूरा हो जायेगा।
महाराज श्री ने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पलो का वृतांत सुनाते हुए कहा कि जो मानव शरीर हमे मिला हैं जान मानस को मिला हैं ये मानव जीवन देवताओ के लिए दुर्लभ हैं हमे पता हैं कि मानव जीवन बहुत महत्वपूर्ण हैं लेकिन हमे इसकी क़द्र होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हैं कोई इस जीवन को अहम से नष्ट कर रहा हैं तो कोई जवानी के नशे से नष्ट कर रहा हैं तो कोई गंदे नशे से नष्ट कर रहा हैं नष्ट किये जा जा रहा हैं। कृष्ण कथा में सांसारिक वस्तुओं की इच्छा लेकर नहीं, अपितु भगवान की इच्छा लेकर सुनिये। कथा के दौरान भक्ति गीतों पर भक्त नाचने झूमने लगे। पहले दिन की कृष्णा कथा में हजारों की संख्या में भक्त पहुंचे।
जीवन की यात्रा मंगलमय और सुखद बनानी हैं तो अपने गुरु को हमेशा साथ लेकर चलो और सीधा और सरल उदहारण धुर्व हैं जो सादे पांच साल के थे जब उन्होंने अपने गुरु के चरण पकड़ लिए थे और पह्रलाद जिन्होंने गर्भ में ही अपने गुरु के चरण पकड़ लिए गर्भ में ही श्री नारद से ज्ञान प्राप्त हुआ गर्भ में... आप सभी तो अपनी उम्र के उस पड़ाव में हो जंहा सब समझदार हैं और अपनी जिंदगी का एक हिस्सा जी चुके हो और गुरु के नाम के लिए आज भी यही कहते हैं कि अभी उम्र नहीं हुई। ........गुरु पाने के लिए..... अगर अपने जीवन को सुखद बनाना हैं तो जीवन में गुरु को ले आइये गुरु की शिक्षा आपके जीवन को सर्वोपरि बना देगा, जीवन को जीना सीख जाओगे कैसे अपने जीवन को सुखमय बनाया जाये ये सीख जाओगे। सर्प से क्या सीखा ? सर्प कभी भी अपने लिए घर नहीं बनाता कभी भी नहीं बनता अपना घर। और आप बताइये हमारी कितनी आयु हैं ६०, ६५, ८५, बस फिर भी हम ये सब सोचते हैं।
एक मनुष्य को यही प्रार्थना करनी चाहिए। "जब मुझे बुलावो तो लवो पर आखिरी तेरा नाम होना चाहिए , लवो पर आखिरी तेरा नाम होना चाहिए दुनिया को भूल जाऊं चित्त में दर्शन होना चाहिए , सिर्फ तेरा दर्शन होना चाहिए।"
राधे राधे बोलना पड़ेगा।।
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