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पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 4 से 10 जनवरी तक, सी. डी. पार्क, साल्ट लेक, कोलकाता आयोजित श्रीमद भागवत कथा के सप्तम दिवस पर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।





आज की कथा का प्रारम्भ एक सुन्दर भजन के साथ किया। महाराज जी ने कहा की श्री शुकदेव जी गंगा नदी के तट पर बैठ कर राजा परीक्षित को भागवत कथा सुना रहे है और हम सब भी सौभाग्यशाली है की गंगा के किनारे हम सब भी भगवत कथा का श्रवण कर रहे है। माँ भगवती यहाँ पहुंच कर अपनी यात्रा को पूरा करती है गंगा सागर में मिलकर। भगवान् हम सभी की यात्रा भी पूरी करे ठाकुर के चरणों में मिलकर। जो लोग ये कहते है की भक्ति करना उन लोगो का काम है जो कुछ नहीं करे सकते लेकिन मै यह कहता हूँ की भक्ति करना बहुत हिम्मत का काम है वो ही प्राणी भक्ति कर सकता है जो धैर्य, साहस और प्रभु में पूर्ण विश्वास हो वही सच्ची भक्ति कर सकता है।
कल के क्रम में ठाकुर का विवाह रुक्मणि जी के साथ हुआ। द्वारिका में भगवान् ने अपना राज्य स्थापित किया। महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था। श्री कृष्ण के 18 हजार से अधिक विवाहों के कारणों पर विस्तार से प्रकाश डालते महाराज जी ने कहा कि मोर आजीवन ब्रह्मचारी होता है। उसके आंसुओं को धारण करके मोरनी गर्भ धारण करती है। श्री कृष्ण भी मोर पंख धारी हैं। भगवान श्री कृष्ण की भी शादियों और पुत्रों की कुछ ऐसी ही लीलाये हैं। वे गोपियों के साथ तो रहते हैं। लेकिन उनका संग नहीं चाहते। करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ। भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया।
भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।
इस मायावी दुनिया में देखा गया है कि जो प्यारा लगता है, हमें उसके अवगुण नहीं दिखाई देते और जिसे नापसंद करते हैं, हम उसके गुण नहीं देखते। नज़रिये के अनुसार ही नज़ारे दिखते हैं। लेकिन ध्यान रखना धर्म के विरुद्ध कभी मत जाना। बुराइयां खुद के लिए गड्ढा खोदती हैं। लेकिन जो सच प्रभु को प्रसन्न करना चाहते हो तो हमेशा दूसरों को खुशियां देना सीखो तुम्हें अपने आप खुशियाँ मिलती जाएँगी। अगर आपको कोई गलत बोले तो भी बुरा न मानो क्योकि वो कही न कही हमारे ही कर्म ही काट रहा है। क्योकि संसार में आने से पहले ही हमारा समय , स्थान और कारन निश्चित कर देता है इसलिए अपने कर्मो को हमेशा सही रखना तो ईश्वर सदैव आपका हाथ थामे रखेगा।
" राधे राधे बोलना पड़ेगा। "

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