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पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 फरवरी से 12 फरवरी 2018 तक ऊना (हिमाचल) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।






महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की जो फल ओर युगो में यज्ञ, तप करने से मिलता है वो फल कलयुग में भगवान का कीर्तन करने से मिलता है, भगवान की कथा श्रवण से वो फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। कलयुग सर्प की तरह है हमारी तरफ बढ़ रहा है, हर इंसान को खा जाना चाहता है, इससे बचने के लिए एक ही उपाय है वो ये है की श्री शुकदेव जी द्वारा कही गई श्री भागवत कथा की शरण ग्रहण कर लेनी चाहिए।अगर बचपन में कथा सुनोगे तो जवानी सुधर जाएगी और अगर जवानी सुधर जाए तो बुढ़ापा सुधरने की शत् प्रतिशत गारंटी है।
महाराज श्री ने कहा की आधुनिक शिक्षा में ये सीखाया जाता है की पैसा ही सबकुछ है, लेकिन ये सत्य नहीं है, जबकि सत्य ये है की भगवान सबकुछ हैं। महाराज श्री ने कहा जब आप लगातार दिल से कथा सुनते जाओगे, जिस भी भगवान की कथा सुनते जाओगे वो नित निरंतर आपके ह्रदय में वास करने लगेंगे। भगवान की कथाएं प्रभु के दर्शन से भी ज्यादा लाभ देती हैं। जो लोग मन से कथा नहीं सुनते संदेह उन्ही को होता है, जो लोग कथा को मन से सुनते हैं उन्हें संदेह हो ही नहीं सकता क्योंकि हर संदेह का निवारण कथा के बीच में ही है। युवाओं को कहा की महाभारत की वजह द्वेष है, जहां सम्मान नहीं होता वहां द्वेष होता है। आजकल हमारे समाज में बड़ो की इज्जत नहीं होती। महाराज जी ने कहा की आपके कर्म ही आपका विनाश या विकास करते है।
ठाकुर जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कहा कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते महाराज श्री ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

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