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पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 फरवरी से 12 फरवरी 2018 तक ऊना (हिमाचल) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।






“अच्छे कर्म करिए, मरने के बाद शरीर छूटता है कर्म याद रहते हैं।"

ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की संतो का दर्शन और भागवत कथा आपको मिल जाए तो आपके ज्यादा धनवान कोई नहीं है इस संसार में, ये दो दुर्लभ वस्तुएं आपको मिली हुई हैं।
महाराज जी ने कहा की अगर आपके अच्छे कर्मों को आपके मरने के बाद लोग याद रखते हैं तो भले ही आपका शरीर ना रहे पर आप कर्मों के हिसाब से लोगों के दिलो दिमाग में हमेशा अमर रहते हैं। उन्होंने कहा की हमे सोचना चाहिए की शरीर मरता है कर्म नहीं मरते। इसलिए घर बड़ा हो या ना हो फर्क नहीं पड़ता लेकिन कर्म बडे होने चाहिए।
महाराज जी ने कहा की बच्चों को संस्कार देना मां बाप की जिम्मेदारी है। जिन घरो के बडे बुजुर्ग अपने बच्चों को संस्कार नहीं देते हैं वो अपने लिए आने वाला समय खतरनाक बनाते हैं। ये कह देना आसान है की हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं पर ये समझ पाना बहुत मुश्किल है की उनके मां बाप कहां उन्हें संस्कार दे पा रहे हैं।
महाराज जी महाराज ने कहा की जिसका पूरा घर ऋणी है वो है गृहिणी, गृहिणी का ऋण पूरा परिवार भी मिल कर नहीं उतार सकता। मां को, गृहिणी को कभी छूट्टी नहीं मिलती है, उन्हें 24 घंटे, 12 महीने काम करना पड़ता है।
महाराज जी ने कहा की भगवान को प्राप्त करने के लिए एक सुंदर मार्ग है और वो है सेवा। महाराज जी ने कहा की भगवान को प्राप्त करना चाहते हो तो सेवा करो। जो लोग संतो की, अनाथों की, बुजुर्गों की सेवा करते हैं वो धीरे धीरे भगवान की करीब होने लगते है, जितनी सेवा करोगे अहंकार उतना ही कम होगा लेकिन अहंकार तब ही कम होगा जब आप स्वयं जा कर सेवा करेंगे ना की किसी को पैसे देकर।
महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने 16100 रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। भगवान अपने मुकुट पर मोर पंख इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है। मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है। इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है।
भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा बढ़ाते हुए कहा कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी।
सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया।
महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा।
श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए ।
" राधे राधे बोलना पड़ेगा। "

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