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पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जनवरी से 2 फरवरी प्रिंसेस श्राईन,पैलेस ग्राउंड,बंगलुरु में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।






आज सप्तम दिवस की कथा का प्रारम्भ प्रभु के भजन से किया " डूबते को बचाने वाले , मेरी नैया तेरे हवाले। " और बताया की जब हम अपने जीवन की डोर भगवान् को सौप दे तो फिर हमे किसी भी बात की चिंता नहीं करनी पड़ती। जन्म से मृत्यु तक सब कुछ भगवान् स्वयं उनकी रक्षा करते है। हमे अपने बच्चों को भी धर्म की राह पर चलना चाहिए उनको धर्मात्मा बनाना चाहिए क्योकि जब बच्चो में संस्कार देंगे तो वो भी भगवान् की शरणागत होंगे और भगवान् की शरण में जो आ जाता वो फिर कभी भी संसार के दुःख से कभी विचलित नहीं हो सकता है। और जो भगवान् से विमुख हो जाता है उसका पतन निश्चित हो जाता है। उदाहरण भी प्रत्यक्ष है सुग्रीव जी प्रभु के शरणागत हुए तो किष्किंधा के राजा बने , बिभीषन ने प्रभु के शरण आये तो लंका का राज्य मिला वो लंका जिसको रावण ने अपने दस सर की आहुति देकर भोलेबाबा से प्राप्त किया लेकिन बिभीषन ने सर नहीं काटा बस प्रभु के शरण में अपना शीश झुकाया और वो लंका को प्राप्त किया।
कारन क्या था ? रावण की भक्ति में अहंकार था और अहंकारी को अपना सर कटवाना ही पड़ता है उसने तो स्वयं ही काट लिए तब लंका प्राप्त की। परन्तु बिभीषन ने भक्ति में श्रद्धा की समर्पण किया और माँगा नहीं प्रभू ने स्वयं ही दिया। रावण की पत्नी ने रावण से कहा- राम विमुख असहाल तुम्हारा की एक लाख पुत्र और सवा लाख नाती होने के बाबजूद भी उसके घर दिया जलने वाला भी कोई नहीं बचा। तो आप भक्ति करो पर अहँकार से नहीं भाव से करो श्रद्धा से करो। जो भगवान् की शरण में आता है उसको फिर मृत्यु का भय नहीं रहता। देखो राजा परीक्षित को की भागवत का ज्ञान सुनने के वो स्वयं अपनी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे है। उनको अब काल का यानि तक्षक का कोई भय नहीं रहा। जिसने जन्म लिया है वो मृत्यु को प्राप्त होगा ही। प्रत्येक जीव के जन्म से पहले ही उसकी मृत्यु का समय , स्थान और कारन ये निश्चित हो जाता है।
कथा के क्रम को आगे बढ़ाया और बताया की रुक्मणि और भगवान् श्याम सुन्दर का विवाह हुआ और उनका प्रथम पुत्र को जन्म होते ही एक संभरासुर नामक राक्षस उठा ले गया क्योकि उसको पता था की श्री कृष्ण का प्रथम पुत्र उसकी मृत्यु का कारन होगा। तो वो प्रद्युम्न समुद्र में फेक देता है वहां एक मछली उसको निगल जाती है और वो फिर संभरासुर की रसोई में ही पहुँच जाती है और उसका पालन पोषण काम देव की पत्नी ने स्वयं माँ की तरह कर उसको बड़ा किया। प्रद्युम्न कामदेव का जी जन्म है और ये पहली पत्नी थी जिसने अपने पति को माँ की तरह पला। जब प्रद्युम्न बड़े हुए तो संभरासुर का वध कर के द्वारिका को पत्नी सहित प्रस्थान किया।
महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने 16000 रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

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