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पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।




भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा से पूर्व बजरंग दल खाटूश्याम के सदस्यों द्वारा महाराज श्री को पगड़ी पहानकर एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संस्कृत, संस्कृति और संस्कार इस देश की वो धरोहर है जिसकी वजह से हमारे देश का मान सम्मान सिर्फ भूमंडल पर ही नहीं अपितु इस की वजह से भारत जैसे पुनित देश का डंका स्वर्ग में भी बजता है। मेकाले जब भारत आया तो उसने अपने सदन में एक बात कही थी कि मैने भारत के हर एक कोने को जा जाकर देखा है और इस भारत को हम गुलाम बनाने के लायक नहीं है। यह इतना संपन्न देश है कि मुझे इस देश में एक भी भिखारी नजर नहीं आया। इस देश की सबसे बड़ी सपत्ति इसके संस्कार है, यहां एक से एक आदर्श व्यक्तित्व रहता है। मेकाले उस देश की बात कर रहा है जहां आज एक भी लड़की सुरक्षित नहीं है। मेकाले कहता था यह देश तब तक गुलाम नहीं बन सकता जब तक हम इसकी संस्कृति, संस्कृत और संस्कार को खत्म नहीं कर देते। आजकल अगर कहीं हम अगर दो अंग्रेजी बोलने वालों के बीच में हिंदी बोलने लग जाएं तो लोग समझते हैं हम अनपढ़ आदमी हैं। अपने देश में जैसी दुर्दशा भारतीयों की है वो शायद ही किसी देश में हो। इस देश में हिंदी बोलने वालों को हीन भावना से देखा जाता है। संस्कृति को बचाने की जो बाते करे हम उसे संस्कृति बचाने वाला ऐजेंट समझने लगते हैं। दुनिया मे कई देश ऐसे हैं जो इंग्लिश तो जानते हैं लेकिन बोलना नहीं चाहते वो अपने राष्ट्रीय भाषा बोलते हैं। चीन वाले चीनी भाषा बोलते हैं, जापान में जापानी बोलते हैं लेकिन भारत में हिंदी बोलने वाले को अनपढ़ समझते हैं। विश्व का एक पावरपुल देश ही चीन क्योंकि उसने अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ा। भारत आज भी दूसरों के आगे गिडगिडाता हैं क्योंकि हमने अपनी संस्कृति का अपमान अपने हाथों से किया है। मेकाले की यह रणनिती थी की इनको मेंटेली ऐसा तैयार कर दो कि यह शरीर से तो आजाद हो जाएं लेकिन दिमागी तौर पर कभी आजाद ना हो पाएं उसके लिए उसने कॉन्वेंट की व्यवस्था की क्योंकि उसको पता था की यह संस्कार गुरूकुलम से आते हैं वहां ऋषि मुनी, योगी उनको ज्ञान देते हैं। महाराज जी ने कहा कि आज आप अपने दिल से पूछिए की क्या आप अपने बच्चों के चरित्र पर ध्यान देते हैं, बस ही चीज पर ध्यान देते हैं मार्क्स कितने आए, दूसरा यह बनेगा क्या, कभी भी इस बात पर ध्यान नहीं रहता है कि इसका चरित्र कैसा है ? जिस चरित्र को पाश्चात्य कल्चर ने कुछ नहीं समझा वहीं चरित्र हमारी संपत्ति है।
महाराज जी ने कहा कि जब गुरूकुलम की पद्दति थी तब 90 प्रतिशत लोग साक्षर थे और जब से कॉवेंट आएं है तो देख लो कितने प्रतिशत लोग साक्षर हैं। उस समय ऋषि मुनी पढ़ाया करते थे और साक्षर बनाया करते थे। उस समय हमारे यहां सोने चांदी की सिक्के चला करते थे, भारत को सोने की चिडिया कहा जाता था। हर कोई यह चाहता है कि हमारे देश में बहन बेटियां सुरक्षित हो लेकिन कोई यह जानना नहीं चाहता की क्यों सुरक्षित नहीं है। वो इसलिए सुरक्षित नहीं है क्योंकि आपके बच्चे चरित्रवान नहीं है। हमारे बेटे चरित्रवान हो जाएंगे तो हमारी बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी। आपकी बेटियां सुरक्षित हो उसके लिए आपके बेटे का चरित्रवान होना जरूरी है।
महाराज जी ने आगे कहा कि श्रीमद्भागवत कथा वेद रूपी वृक्ष का पका हुआ फल है। विश्व में जितने भी फल में उसमें कुछ ना कुछ त्यागने योग्य वस्तुए हैं लेकिन इस फल में कुछ भी त्यागने योग्य नहीं है। भागवत हमें सब कुछ देती है, जिसे भक्ति चाहिए भक्ति लो, जिसे ज्ञान चाहिए ज्ञान लो, जिसे वैराग्य चाहिए वैराग्य लो और जिसे कुछ नहीं चाहिए उसे मोक्ष तो सहज में प्राप्त करा देती है भागवत। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।



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