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"ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है”



विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। 24 सितंबर को ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में जन्माष्टमी का भव्य महोत्सव मनाया जाएगा

"ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है”
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कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।
भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई । भागवत आरती मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी द्वारा की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अंतिम समय में नाम मिल जाए, धाम मिल जाए, भगवान मिल जाए या कथा मिल जाए, होनी तो मुक्त ही हैं। ये चारों बराबर हैं। जीवन भर पाप किए हों और अंत समय में सदबुद्धि आ जाए की हमें धाम में ही रहना है तो कल्याण होना निश्चित है। लेकिन यह भी तभी संभव है जब आप पर किशोरी जी की पूर्ण कृपा हो।
महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में ईश्वर की अहित की कृपा का सबसे बड़ा दर्शन मनुष्य जीवन है। मनुष्य जीवन प्राप्ति के बाद हमारा मन उनकी तरफ आकर्षित हो जाए यह ठाकुर जी की अहित की कृपा है। ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है।
महाराज श्री ने कहा कि अपने धर्म के प्रति वफादार बनिए और दिखावा मत किजिए, भगवान पर पूर्ण भरोसा किजिए। आपको जब भी समय मिले आपको पुराणों की कथा सुननी चाहिए, इससे हमारा चित्त परमात्मा की तरफ आकर्षित होता है, बुराईयों की तरफ नहीं जाता। अगर चित्त बुराई की तरफ चला गया तो यम के द्वार पर जाना ही पड़ेगा लेकिन चित्त गोविंद के चरणों में चला गया तो हमारा जो उद्देश्य है हमे प्राप्त हो जाएगा। पुराण हमें पुरूषोत्तम की तरफ लेकर जाते हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।
कथा पंडाल में मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी, श्री एच. पी.अग्रवाल जी, श्री जे पी सिंघल जी (मामा), श्री राजेश कुमार सिंह जी, श्री सतीश गर्ग जी, श्री श्रीपाल जिंदल जी, श्री अनिल त्यागी जी, श्री सुरेश जांगिड जी, श्री संजय अग्रवाल जी, श्री संजय चतुर्वेदी जी, श्री शेराराम भादू जी, श्री बिजेंदर सोनी जी, श्री सूरज बंसल जी, श्री अशोक कुमार खुराना जी, श्री रामगोपाल बागला जी, श्री विपिन बाजपाई जी आदि भक्त वृन्द मौजूद रहें।

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